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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

मनुष्य उस कोटि की पहुँची हुई सत्ता है, जो उस अल्प क्षण में ही आत्मप्रसार को बद्ध रखकर संतुष्ट नहीं हो सकती—जिसे वर्तमान कहते हैं। वह अतीत के दीर्घ पटल को भेदकर; अपनी अन्वीक्षण बुद्धि को ही नहीं, रागात्मिका वृत्ति को भी ले जाती है।