मनुष्य का आकांक्षित; मंगल उसके अभ्यस्त संस्कार के अंतराल में रहता है और मंगलदाता तभी दंडित होते हैं, जभी प्रदत्त मंगल का अभ्यस्त संस्कार के साथ विरोध उपस्थित होता है, और इसीलिए प्रेरित-पुरूष स्वदेश में कुत्सामंडित होते हैं।
अनुवाद :
श्रीरामनंदन प्रसाद