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लीलाधर जगूड़ी के उद्धरण

मैं ख़ुद को भुला देने के लिए फिर एक नई कविता रचता हूँ, और फिर उससे आगे किसी और नई कविता की ओर बढ़ जाता हूँ। मैंने अब तक क्या-क्या सोचा, किया और लिखा—उसे याद रखता हूँ, पर दोहराता नहीं हूँ।