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दुर्गा भागवत के उद्धरण

महाभारत को अनदेखा कर, सामाजिक आशयों का सम्यक स्वरूप पहचानना या विशद करके बताना संभव नहीं है।

अनुवाद : वासंतिका पुणतांबेकर