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अवनींद्रनाथ ठाकुर के उद्धरण

कोई काम को सुंदर रूप में देख रहा है, इसलिए वह रात-दिन काम-धंधे की ओर ही दौड़ता रहता है, कोई अकाज को सुंदर देख रहा है, इसलिए वह उसी ओर चला जा रहा है, किंतु दोनों के मन में बना रहता है सुंदर काज अथवा सुंदर अकाज।

अनुवाद : रामशंकर द्विवेदी