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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

केवल जानने से ही मनुष्य के जीवन में, उसके संपूर्ण व्यक्तित्व में उन्नति नहीं होती। जाने हुए स्वरूप की ओर जब हृदय आकर्षित होता है, और उस स्वरूप तक पहुँचने के लिए व्यक्ति का स्वरूप उसके मेल में होने लगता है—तभी जीवन की साधना का आरंभ होता है।