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अवनींद्रनाथ ठाकुर के उद्धरण

कविता में छंद शब्दों को एक गति दे देता है, छंद के वश में होकर शब्द अनेक लयों-विलयों में क़दम बढ़ाते हुए चलते हैं।

अनुवाद : रामशंकर द्विवेदी