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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

कवि को प्रकृति कानन में विचरण करना रहता है, दूसरे प्रयोजन से यात्रा करनेवालों के समान केवल इस पार से उस पार निकल जाना नहीं।