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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

कवि की दृष्टि तो सौंदर्य की ओर जाती है, चाहे वह जहाँ हो—वस्तुओं के रूपरंग में अथवा मनुष्यों के मन, वचन और कर्म में।