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श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र के उद्धरण

कपटाशय के मुख की बात के साथ अंतर का भाव विकसित नहीं होता, इसीसे आनंद की बात में भी मुख पर निरसता के चिह्न दृष्ट होते हैं। मुँह खोलने से होता ही क्या है, हृदय में भाव की स्फ़ूर्त्ति नहीं होती।