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गजानन माधव मुक्तिबोध के उद्धरण

कलात्मक चिंतन के बिना समीक्षा-कार्य नहीं चल सकता। उसी प्रकार वास्तविक जीवन-ज्ञान और जीवन-चिंतन के बिना, उसका मानव-विवेक और कलात्मक विवेक (ये दोनों, एक तरह से पृथक् और दूसरी तरह से अभिन्न हैं) नहीं हो सकता।