Font by Mehr Nastaliq Web

महादेवी वर्मा के उद्धरण

कला, जीवन की विविधता समेटती हुई आगे बढ़ती है, अतः संपूर्ण जीवन को गला-पिघलाकर तर्क-सूत्र में परिणत कर लेना उसका लक्ष्य नहीं हो सकता।