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श्यामसुंदर दास के उद्धरण

ज्यों-ज्यों हम ललित कलाओं में उत्तरोत्तर उत्तमता की और बढ़ते है, त्यों-त्यों मूर्त आधार का परित्याग होता जाता है।

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