अवनींद्रनाथ ठाकुर के उद्धरण
जो शक्तिमंत रचनाएँ होती हैं, उनमें भी श्री अवश्य होती है और जो श्रीमंत रचनाएँ होती हैं उनमें शक्ति नहीं होती, ऐसा नहीं है; जैसे—रूपवान और रूपसी ये दोनों भिन्न होते हैं, वैसे ही यहाँ पर शक्तिशाली रचना में एक प्रकार का पुरुष भाव और श्रीसंपन्न रचना में एक प्रकार का सुकुमार भाव को लक्षित कर दो अलग-अलग प्रकार की रचनाएँ समझी जाति हैं।
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