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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

जो केवल अपने विलास या शरीर-सुख की सामग्री ही प्रकृति में ढूँढ़ा करते हैं, उनमें रस रागात्मक 'सत्त्व' की कमी है, जो व्यक्त सत्ता मात्र के साथ एकता की अनुभूति में लीन करके, हृदय के व्यापकत्व का आभास देता है।