जो देश या जाति; अपने स्वेछाचारी व्यक्तियों की स्वेच्छाचारिता की जड़ पर कुठार चलाना अपना कर्त्तव्य नहीं समझती, वह स्वेछाचारिता की कठोरता को भूलती जाएगी और अंत में निरंकुशता पर पाश; उसे मानसिक शिथिलता के उस गहरे गड्ढे में जा फेंकेगा, जहाँ उसे श्रावण के अंधे के समान हर ओर हरियाली ही हरियाली दीख पड़ेगी, और जिसका अंधकार उसके नेत्रों को स्वाधीनता के प्रकाश की एक झलक को भी देखने में असमर्थ बना देगा।