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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

जो भावुक और रसज्ञ न होकर; केवल अपनी दूर की पहुँच दिखाना चाहते हैं, वे कभी-कभी आधिक्य या न्यूनता की हद दिखाने में ही फँसकर, भाव के प्रकृत स्वरूप को भूल जाते हैं।