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कुँवर नारायण के उद्धरण

जो भाषा कविता की बुनियाद है; वही अगर समाज के निहित स्वार्थों द्वारा शोषण और झूठ का ताक़तवर साधन बन जाती है, तो कविता के लिए उसमें विश्वसनीय जगह बनाना सबसे मुश्किल होता है।