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प्रेमचंद के उद्धरण

जीवन सूत्र कितना कोमल है। वह क्या पुष्प से कोमल नहीं, जो वायु के झोंके सहता है और मुरझाता नहीं? क्या वह लताओं से कोमल नहीं, जो कठोर वृक्षों के झोंके सहती लिपटी रहती है? वह क्या पानी के बबूलों से कोमल नहीं, जो जल की तरंगों पर तैरते हैं, और टूटते नहीं? संसार में कौन-सी वस्तु इतनी कोमल, इतनी अस्थिर, इतनी सार-हीन है, जिसे एक व्यंग्य, एक कठोर शब्द, एक अन्योक्ति भी दारुण, असह्य घातक है! और एस भित्ती पर कितने विशाल, कितने भव्य, कितने बृहदकार भवनों का निर्माण किया जाता है।