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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

जिस सौंदर्य की भावना में मग्न होकर; मनुष्य अपनी पृथक् सत्ता की प्रतीति का विसर्जन करता है, वह अवश्य एक दिव्य विभूति है।