अवनींद्रनाथ ठाकुर के उद्धरण
जिस रचना का हेतु अपने आप रस का उद्रेक करना हो उसे हम अहेतुक रचना कह सकते हैं। नहीं तो हेतु न हो, कारण न हो, कोई कुछ निमित्त भी ना हो, फिर भी एक रचना हो गई हो––ऐसा होता नहीं है।
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