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स्वामी विवेकानन्द के उद्धरण

जिस केंद्र में विषय-अभिघात से उत्पन्न संवेदनाओं के अवशिष्ट अंश या संस्कार मानो संचित से रहते हैं, उसे मूलाधार कहते हैं और उस कुण्डलीकृत क्रियाशक्ति को कुण्डलिनी कहते हैं।