जिस जाति के धर्मगुरु कविता पर, साहित्य पर बंदिश लगाते हैं, उस जाति पर हम साधुओं को दया आती है। हमें उस जाति के भविष्य के बारे में भी चिंता होती है। कालिदास बच गए। उन्होंने 'कुमार संभव' में तो शिव-पार्वती के रमण का वर्णन किया है, तो शैव उन्हें त्रिशूल से मार डालते, पर तब धर्मगुरु संकीर्ण नहीं थे।