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वेंकी रामकृष्णन के उद्धरण

हम यह सोचकर नहीं जीते कि हम जिस शहर में रहते हैं, वह एक दिन मिट जाएगा। फिर भी शहर और पूरा समाज, साम्राज्य और सभ्यता-उपक्रम विकसित होते हैं और ख़त्म हो जाते हैं। ठीक वैसे, जैसे कोशिकाएँ मरती हैं।

अनुवाद : अमित कुश