हिंदी पत्रिकाओं में पुस्तक-समीक्षा आमतौर पर उस साहित्यिक बेगार की तरह है, जो किसी भी लेखक से लिया जा सकता है और जिसमें ज़्यादातार वे नौसिखिए पकड़े जाते हैं, जो साहित्य के नाम पर अपनी दिमाग़ी भड़ास निकालना चाहते हैं; क्योंकि उन्हीं के पास वह मुफ़्त समय होता है, जो बड़े-बड़े लेखकों के पास नहीं होता।