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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

हास-परिहास और छेड़छाड़; प्रेम की उमंग का एक ऐसा स्वाभाविक रोग है, जिसे हमारे कृष्णभक्त कवियों ने ही पूरा-पूरा पहचाना है और भारतीय शृंगार काव्य की एक विशेषता के रूप में हमारे सामने रखा है।