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श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र के उद्धरण

हँसो, किंतु विद्रूप में नहीं। रोओ, किंतु आसक्ति में नहीं—प्यार में, प्रेम में। बोलो, किंतु आत्मप्रशंसा या ख्याति विस्तार के लिए नहीं।

अनुवाद : श्रीरामनंदन प्रसाद