महादेवी वर्मा के उद्धरण
हमारी संस्कृति-प्रवाहिनी ऊपर से सम और शांत है परंतु उसके तल में अनेक ज्वालामुखियाँ जली बुझी हैं, असंख्य तूफ़ान जागे-सोए हैं। दर्शन, धर्म, साहित्य, नीति, कर्म आदि सभी क्षेत्रों में विद्रोहियों की स्थिति रही है पर तोड़ने वाले हथोड़े को मूर्तिकार की छेनी बना लेने की विशेषता हमारी अपनी है। इसी कारण विद्रोह ने हमारी जीवन-प्रतिभा को पूर्णता दी है, उसे विकलांग नहीं किया।
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