हमारे व्यक्तित्व की सीमांत दीवारें हमें अपनी सीमा की ओर भी धकेलती हैं और इसी तरह हमें असीम की ओर भी ले जाती हैं। केवल जब हम इन सीमाओं को असीम बनाने की कोशिश करते हैं, तभी हम परस्पर-विरोधी भावनाओं में संघर्ष पाते हैं और तभी हमें दुःख उठाना पड़ता है।
अनुवाद :
सत्यकाम विद्यालंकार