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रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरण

हमारे देश में भी व्यक्ति-स्वातंत्र्य को साधना का विषय समझा गया था, लेकिन उस स्वातंत्र्य को संकीर्ण अर्थ में नहीं लिया गया।

अनुवाद : विश्वनाथ नरवणे