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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

'ज्ञानयज्ञ' का अभिप्राय बुद्धि और हृदय, बोधवृत्ति और रागात्मिका वृत्ति—दोनों को ब्रह्म या परमात्मा में लगाना है।