गुरु में पहले तो यह देखना चाहिए कि वे शास्त्रों के मर्म को जानते हों। सारा संसार बाइबिल, वेद, कुरान आदि धर्मशास्त्रों को पढ़ा करता है, पर ये सब तो केवल शब्दसमूह, व्याकरण के नियमसूत्रों द्वारा संगठित वाक्यरचना, शब्दरचना और शब्दशास्त्र ही हैं। ये तो धर्म की सूखी, नीरस अस्थियाँ मात्र है।
अनुवाद :
पण्डित द्वारकानाथ तिवारी