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धूमिल के उद्धरण

ग़ुस्सा बाज़ार की चीज़ नहीं है, वह चरित्र भी नहीं है। अलबत्ता तुम्हारा यह ग़ुस्सा, तुम्हारी नाक के बीच से उछलता है और एक आदमी की जेब में गिर जाता है, और उसके बाद एक समय होता है कि यही ग़ुस्सा, ज़्यादा-से-ज़्यादा हिजड़े की 'अय-हय' होता है।