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हरिशंकर परसाई के उद्धरण

गाँधी जयंती पर जितना झूठ बोला जाता है, उतना कुल मिलाकर साल भर में नहीं बोला जाता। दूसरे दिन झूठ बोलने में थोड़ा खटका लगता है। दो अक्टूबर को बेखटके झूठ बोला जाता है। दो अक्टूबर को असत्य-पर्व के रूप में मनाना चाहिए।