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निर्मल वर्मा के उद्धरण

एक महान कलाकृति मनुष्य को नहीं बदलती, न उसके संसार को बदलती है। वह सिर्फ़ उस रिश्ते को बदलती है; जो अब तक मनुष्य अपने संसार से बनाता आया था, लेकिन एक बार रिश्ता बदल जाने के बाद न तो वह मनुष्य ही वैसा मनुष्य रह पाता है, जैसा वह कलाकृति के संपर्क में आने से पहले था, न उसका संसार वैसा संसार रह जाता है, जो उसे कलाकृति के अनुभव के बाद दिखाई देता है।