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हरिशंकर परसाई के उद्धरण

एक-दो संयुक्तांक और फिर अंतिम अंक—हिंदी-पत्रिकाओं की यही गति है, दुर्गति ही है। उन पत्रों की बात अलग है, जिन्हें रईस निकालते हैं। यह उनका शौक़ है। जैसे पटियाला-नरेश पहलवान पालते थे, वैसे ही रईस पत्र-पत्रिका पालते हैं।