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सुधीश पचौरी के उद्धरण

दलित साहित्य को व्यापक जीवन के दलित विमर्श के भीतर ही पढ़ा जा सकता है। यही दलित की देह गाथा है, जिस पर वर्णवादी इतिहास अपनी इबारत लिखता रहा है।