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कुँवर नारायण के उद्धरण

भाषा की तरह साहित्य भी एक शाब्दिक सरंचना ज़रूर है; लेकिन वह केवल भाषा नहीं, एक कलाकृति भी है। जिसके औचित्य का संदर्भ, भाषा के नियमों से पहले कला के नियमों से खोजा जाना चाहिए।