नामवर सिंह के उद्धरण
भक्तों की परंपरा वाचिक परंपरा थी। ‘मसि कागद छुओ नहीं’ कविता लिखकर और कागज़ लेकर पढ़नेवाले आजकल के कवियों की तरह भक्त नहीं थे; बल्कि उनके यहाँ गान का स्वतःस्फूर्त ही विस्फोट होता था। वे सामान्य जनों के बीच में गान करते थे।
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