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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

भक्ति के भीतर दो भावों का मेल होता है—श्रद्धा और प्रेम का। श्रद्धा भगवान के आहाल्य या महत्त्व की भावना से जगती है और प्रेम उनके सौंदर्य की भावना से।