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अवनींद्रनाथ ठाकुर के उद्धरण

बाहर से हमारे मन में सुंदर जिस मार्ग से आता है, असुंदर भी इसी मार्ग से आता रहता है।

अनुवाद : रामशंकर द्विवेदी