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श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र के उद्धरण

अश्रु, पुलक, स्वेद, कंपन होने से ही जो वहाँ भक्ति आई है; ऐसी बात नहीं, भक्ति के इन सब के साथ अपना स्वधर्म-चरित्रगत लक्षण रहेगा ही।

अनुवाद : श्रीरामनंदन प्रसाद