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श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र के उद्धरण

अमृतमय जल कपटी के लिए तिक्त लवणमय होता है, तट पर जाकर भी उसकी तृष्णा निवारित नहीं होती।

अनुवाद : श्रीरामनंदन प्रसाद