अगर कोई कहे कि विषमता में से गुज़रकर ही हम अंत में समत्व और एकत्व को प्राप्त कर लेंगे, तो हमारा उत्तर यह है कि जिस धर्म की दुहाई देकर ये बातें कही जाती है, वही बारंबार कहता है कि कीचड़ से कीचड़ नहीं धुल सकता। मानों अनैतिकता से कोई नैतिक या सच्चरित्र बन सकता है।