आज़ादी के बाद जिस तेज़ी से भारत में एक नए संपन्न मध्यवर्ग का उदय हुआ है, उसके समानांतर अरसे से 'गँवार' समझा जाने वाला हिंदी साहित्य भी, शहराती और 'आधुनिक' हुआ है। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह नया मध्यवर्ग अपनी संपन्नता के बावजूद जितना असंस्कृत और फूहड़ है, उसकी रुचि को तुष्ट करने वाला साहित्य भी कम फूहड़ नहीं है।