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गजानन माधव मुक्तिबोध के उद्धरण

आलोचना हमेशा तटस्थ और निष्पक्ष नहीं हुआ करती। वह बहुधा दृष्टि की बजाए मात्र एक भावावेश होती है, और दिल का कीमियागर उस भावावेश पर बनावटी आँखें जड़ देता है।