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श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र के उद्धरण

आज उपकृत हुआ हूँ; इसलिए कल फिर स्वार्थांध होकर अपकृत होने का बहाना कर, अकृतज्ञता को मत्त बुला लो। इससे बढ़कर इतरता और क्या है? जिस किसी से पूछ लो।

अनुवाद : श्रीरामनंदन प्रसाद