नागरक को चाहिए कि वह महीने में एक-दो बार किसी निश्चित तिथि को सुंदर वेश-भूषा से सज-धज कर, घोड़े पर चढ़कर, नौकर-चाकरों तथा वेश्याओं के साथ उद्यान-यात्रा के लिए प्रस्थान करे। वहाँ पहुँच कर नित्यकर्म का संपादन कर मुर्ग़ा, तित्तर, बटेर, बुलबुल आदि पालतू पक्षियों की युद्धकला देखे; जूआ, शतरंज आदि खेलों को खेलते हुए वेश्याओं के साथ मनोरंजन का सुख अनुभव करे, फिर शाम को घर लौट आए।