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कुँवर नारायण के उद्धरण

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की दृष्टि मूलतः सांस्कृति-ऐतिहासिक थी। पहले के साहित्यों के बारे में उन्होंने मूल्यवान जानकारी और चिंतन दिया है, लेकिन समकालीन साहित्य से सहानुभूति के बावजूद, लगभग बचते रहे।