क्षितिज
आँधी जब थक गई तो न जाने कहाँ जाकर छुप गई। हमेशा की तरह मुँह फुलाकर। सबसे ज़्यादा ग़ुस्सा उसे इस बात पर था कि आसमान उसे ढूँढ़ने भी नहीं निकलेगा। हमेशा यही होता था। क्यों होता था, यह वह आज तक नहीं समझ पाई थी। कोई इतना ख़ाली, ख़ामोश और अकेला होने के बावजूद